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दिवाली का त्यौहार बन रहा सुरेखाबेन जैसे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का जरिया


शहर में ऐसे बहुत से लोग है जो त्यौहार में कुछ धनार्जित कर परिवार का बेहतर पालन-पोषण करना चाहते है

दिवाली का त्योहार बस आ ही गया मानों! दिवाली के त्यौहार में अब मात्र गिनती के दिन बचे हुए है और ऐसे में हर कोई न सिर्फ इसको लेकर उत्साहित है बल्कि लोगों ने इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी है। हालांकि भले ही दिवाली हर परिवार में खुशियां लेकर आता है, कुछ परिवार इस समय को अपने जीवनयापन के साधन के रूप में देखते है। दिवाली के त्योहार में हर कोई परिवार के लिए कपड़े से लेकर अलग-अलग चीजें खरीदता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जिनके लिए त्योहार सिर्फ त्यौहार नहीं बल्कि रोजी रोटी का जरिया भी बन जाता है। एक ऐसा ही नाम है सुरेखाबेन खेर का। 

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लॉकडाउन में गई पति की नौकरी

आपको बता दें कि सुरेखाबेन खेर रोजी-रोटी कमाने के लिए सड़क पर जूट के थैले बेच रही हैं। सुरेखाबेन अपने पति और तीन बेटियों के साथ रहती हैं। लॉक डाउन में उनके पति की नौकरी छूट गई तो घर चलने के लिए उन्होंने बैग बेचना शुरू कर दिया। सुरेखाबेन का कहना है कि तीन बच्चों के साथ उनके परिवार का पालन-पोषण करना बहुत जरूरी है पर चूंकि पति का वेतन घर चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, इसलिए उन्होंने सार्वजनिक सड़कों पर पैर बैग बेचना शुरू कर दिया है।

कभी-कभी नहीं बिकते कोई भी थैला

आगे उन्होंने कहा, आपके परिवार में चार लोग हैं। इस महंगाई के दौर में एक व्यक्ति के वेतन पर घर नहीं चल सकता है, इसलिए मैं कलकत्ता से बैग मंगवाकर सार्वजनिक सड़कों पर बैग बेचने का काम करती हूं। अक्सर ऐसा होता है कि पूरे दिन में एक भी बैग नहीं बेचा जाता है। इस पर उधना से गौरवपथ आने के लिए एक रिक्शा का 400 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है, यानी मैं कमाऊं या नहीं, मुझे 400 रुपये प्रतिदिन खर्च करने पड़ते हैं। मेरा एक बच्चा यहां मेरे साथ आता है। 

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मदद के लिए मुंबई से माँ आई 

आगे उन्होंने बताया कि उनकी माँ जो बम्बई में रहती है। वह अब मदद के लिए यहां सूरत आई हैं। उनकी मां शकुंतलाबेन ने कहा, मैं यहां अपनी बेटी की मदद के लिए बंबई से आई हूं। बड़ी बेटी की फीस भरने में भी काफी दिक्कतें आ रही हैं। मैं अपनी बेटी की मदद के लिए आ रहा हूं क्योंकि वह अकेले काम नहीं कर सकती।

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