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एक नेक काज ये भी; नवरात्रि की पूजा के बाद विसर्जित मटकियों से चिड़ियों के घोंसले बनेंगे!


कल दशहरे के साथ ही माँ दुर्गा के नौ दिनों के पर्व नवरात्री का समापन हुआ। इन नौ दिनों तक गरबी रूप में माताजी की पूजा करने के बाद दशहरे के दिन उन मटकियों का विसर्जन मंदिरों या तापी नदी में किया जाता है। इस समय अबोले जीवों के लिए काम करने वाली संस्था द्वारा विसर्जन के बाद रिसर्जन किया जाता है। इसका मतलब है कि मटकियों के विसर्जन के बाद इन मटकियों को इकट्ठा करके चिड़ियों के घर बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। दशहरे की शाम तक ही 3500 मटकियाँ जमा हो चुकी हैं।

विसर्जित की गई मटकियों को देते हैं घोसले का रूप

आपको बता दें कि नवरात्रि के नौ दिन मिट्टी से बनी गरबी में नित्य दीपक जलाया जाता है, जिससे ऊर्जा का संचार होता है। जिससे वातावरण शुद्ध रहता है। घर में भी सकारात्मकता आती है। दशहरे के दिन इन्हें मंदिरों या तापी नदी में विसर्जित किया जाता है। शहर की श्री चंद्र-अशोक-सोम-करुणा संस्था पिछले 8-9 वर्षों से आस्था को बनाए रखने और दशहरा दिवस पर त्यागी हुई मटली को इकट्ठा करके उससे घोसला बना करके पर्यावरण-उन्मुख दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए काम किया जाता है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से मिट्टी एकत्र कर संस्था के सदस्य, स्कूल कॉलेज के बच्चे मिट्टी से चिड़िया घर बनाते हैं। इतना ही नहीं, वे इसे मुफ्त में बांटते हैं। इस वर्ष भी दशहरे के दिन शाम तक 3500 मटकी एकत्र की जा चुकी है। समाज के लोग भी फोन कर हमें फ्लोर दे रहे हैं। इतना ही नहीं, वे घोसलों को बनाने और उन्हें अपने समाज और घरों में स्थापित करने में भी काम करेंगे।

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हर साल बनाते है करीब 10 से 15 हजार घोसले

संस्था के धरनेंद्र सांघवी ने कहा कि हम मटकी में एक बड़ा छेद बनाकर चिड़िया के लिए एक सुंदर घर बना रहे हैं। दशहरा की शाम तक अडाजन की दो मंदिरों से मटकी जमा कर ली है, अभी काफी कुछ बाकी है। इन मटकियों से हर साल करीब 10 से 15 हजार घोसले तैयार किए जाते हैं।

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